जीएसटी के तहत जॉब वर्क पर लगने वाले कर को लेकर देश में एक नई बहस तेज हो गई है। गुजरात ट्रेडर्स फेडरेशन ने केंद्र सरकार से जॉब वर्क सेवाओं को वस्तु एवं सेवा कर (GST) से मुक्त करने की मांग करते हुए कहा है कि मौजूदा कर व्यवस्था देशभर के लाखों कारीगरों, शिल्पकारों और सूक्ष्म विनिर्माण इकाइयों के अस्तित्व पर गंभीर संकट खड़ा कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय वित्त मंत्री को भेजे गए ज्ञापन में फेडरेशन ने कहा है कि वर्तमान जीएसटी ढांचा श्रम-आधारित उद्योगों को कमजोर कर रहा है और बड़े विनिर्माण प्रतिष्ठानों को अप्रत्यक्ष रूप से अधिक लाभ पहुंचा रहा है। गुजरात ट्रेडर्स फेडरेशन के अध्यक्ष जयेंद्र टन्ना ने इस विषय पर तत्काल नीति हस्तक्षेप की मांग की है।
ज्ञापन के अनुसार, जीएसटी व्यवस्था में एक संरचनात्मक असंतुलन मौजूद है। यदि कोई निर्माता अपने कारखाने में उत्पादन करता है तो आंतरिक श्रम पर जीएसटी लागू नहीं होता, लेकिन वही कार्य यदि स्वतंत्र जॉब वर्कर्स या छोटे कारीगरों से कराया जाता है तो उस पर जीएसटी के साथ अतिरिक्त अनुपालन का बोझ भी उठाना पड़ता है। फेडरेशन का कहना है कि इस असमान व्यवस्था के कारण कंपनियां आउटसोर्सिंग से दूरी बना रही हैं और काम धीरे-धीरे स्वतंत्र कारीगरों तथा पारिवारिक इकाइयों से हटकर बड़े विनिर्माण केंद्रों की ओर स्थानांतरित हो रहा है। इससे भारत की पारंपरिक हस्तशिल्प और कारीगरी की मजबूत उत्पादन व्यवस्था कमजोर होती जा रही है।
फेडरेशन ने चेतावनी दी है कि इसका प्रभाव केवल कर व्यवस्था तक सीमित नहीं है। वस्त्र, चमड़ा, रत्न एवं आभूषण तथा हस्तशिल्प जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में कार्यरत लाखों कारीगरों, महिलाओं और घर-आधारित श्रमिकों के रोजगार पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। बड़े उत्पादन केंद्रों की ओर बढ़ते झुकाव के कारण पारंपरिक कारीगर समूह कमजोर हो रहे हैं, सूक्ष्म उद्योग प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहे हैं और विकेंद्रीकृत विनिर्माण व्यवस्था धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। फेडरेशन का मानना है कि यह स्थिति न केवल रोजगार बल्कि भारत की समृद्ध शिल्प परंपरा और कौशल विरासत के लिए भी गंभीर चुनौती है।
अपने पक्ष को मजबूत करते हुए गुजरात ट्रेडर्स फेडरेशन ने कहा कि जॉब वर्क पर चुकाया गया जीएसटी अधिकांश मामलों में प्रमुख निर्माता द्वारा इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) के रूप में वापस ले लिया जाता है। ऐसे में सरकार को इससे सीमित राजस्व ही प्राप्त होता है, जबकि इसकी सामाजिक और आर्थिक कीमत कहीं अधिक है। फेडरेशन का तर्क है कि जिस कर व्यवस्था से सरकार को अतिरिक्त राजस्व बहुत कम मिलता हो लेकिन लाखों लोगों के रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो, उसकी तत्काल समीक्षा की जानी चाहिए।

फेडरेशन ने सरकार से मांग की है कि कारीगर-आधारित जॉब वर्क पर जीएसटी छूट बहाल की जाए, स्वतंत्र जॉब वर्कर्स को रोजगार सृजन करने वाले महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में मान्यता दी जाए तथा ऐसे कर प्रावधान समाप्त किए जाएं जो छोटे उद्यमों को काम देने से उद्योगों को हतोत्साहित करते हैं। फेडरेशन का कहना है कि इन सुधारों से विकेंद्रीकृत विनिर्माण को नई मजबूती मिलेगी, एमएसएमई क्षेत्र सशक्त होगा, पारंपरिक कौशल संरक्षित रहेंगे और ‘मेक इन इंडिया’ तथा ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसी राष्ट्रीय पहलों को भी बल मिलेगा। संगठन ने जोर देकर कहा कि समावेशी और टिकाऊ औद्योगिक विकास के लिए कारीगरों को सशक्त बनाना अत्यंत आवश्यक है।
गुजरात ट्रेडर्स फेडरेशन ने इस पूरे मुद्दे को केवल कराधान का विषय नहीं बल्कि रोजगार से जुड़ा राष्ट्रीय संकट बताया है। संगठन ने केंद्र सरकार से अपने ज्ञापन पर शीघ्र कार्रवाई करने और भविष्य के संवाद के लिए औपचारिक स्वीकृति देने का अनुरोध किया है। फेडरेशन ने विश्वास व्यक्त किया है कि सरकार आर्थिक विकास और रोजगार सृजन के बीच संतुलन स्थापित करते हुए ऐसा व्यावहारिक समाधान निकालेगी, जिससे लाखों कारीगरों की आजीविका सुरक्षित रहे और देश की विनिर्माण क्षमता भी मजबूत बने। जॉब वर्क पर जीएसटी को लेकर उठ रही यह मांग आने वाले समय में देश की श्रम-प्रधान उद्योग नीति पर व्यापक राष्ट्रीय चर्चा को और गति दे सकती है।
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